जयशंकर-वांग यी बैठक पर चीन के बयान का भारत ने किया कड़ा जवाब, सीमा विवाद पर दोहराया अपना स्पष्ट रुख

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भारत और चीन के बीच हाल ही में हुई विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद दोनों देशों के आधिकारिक बयानों को लेकर नया कूटनीतिक विवाद सामने आया है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री वांग यी की मुलाकात के बाद चीन ने जो आधिकारिक बयान जारी किया, उस पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। भारत ने साफ कहा कि चीनी पक्ष द्वारा जारी की गई जानकारी बैठक में हुई वास्तविक चर्चा और भारत के रुख को पूरी तरह नहीं दर्शाती।

विदेश मंत्रालय (MEA) की ओर से जारी प्रतिक्रिया में कहा गया कि भारत ने बैठक के दौरान सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने को सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। भारत का स्पष्ट मानना है कि जब तक वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पूरी तरह शांति बहाल नहीं होती, तब तक दोनों देशों के संबंध सामान्य नहीं हो सकते। यही बात विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी बैठक में दोहराई।

सूत्रों के अनुसार, इस मुलाकात में सीमा पर लंबित मुद्दों, सैन्य स्तर पर जारी बातचीत और दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली के उपायों पर विस्तार से चर्चा हुई। भारत ने इस दौरान यह भी स्पष्ट किया कि दोनों देशों को पहले से हुए समझौतों और प्रोटोकॉल का पूरी तरह पालन करना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी प्रकार का तनाव उत्पन्न न हो।

चीन की ओर से जारी बयान में दोनों देशों के बीच सहयोग और संबंधों को आगे बढ़ाने पर अधिक जोर दिया गया था। हालांकि भारत का मानना है कि सीमा विवाद जैसे महत्वपूर्ण विषय को नजरअंदाज करके केवल सकारात्मक पहलुओं को सामने रखना वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता। इसी कारण भारत ने अपनी अलग आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी कर अपनी स्थिति स्पष्ट की।

भारत पिछले कई वर्षों से लगातार यह कहता रहा है कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता ही द्विपक्षीय संबंधों की बुनियाद है। वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख में हुए सैन्य तनाव के बाद दोनों देशों के संबंधों में काफी बदलाव आया। इसके बाद कई दौर की सैन्य और राजनयिक वार्ताएं हुईं, जिनके माध्यम से कुछ क्षेत्रों में सैनिकों की वापसी भी संभव हुई, लेकिन अभी भी कुछ मुद्दे पूरी तरह हल नहीं हो सके हैं।

विदेश मंत्री जयशंकर ने बैठक के दौरान यह भी कहा कि दोनों देशों को संवाद बनाए रखना चाहिए और किसी भी ऐसे कदम से बचना चाहिए जिससे सीमा पर तनाव बढ़े। उन्होंने आपसी सम्मान, संवेदनशीलता और समानता के आधार पर संबंधों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत का मानना है कि बातचीत के माध्यम से ही लंबित विवादों का शांतिपूर्ण समाधान निकाला जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत की यह प्रतिक्रिया उसकी अधिक स्पष्ट और आत्मविश्वासपूर्ण विदेश नीति को दर्शाती है। अब भारत किसी भी महत्वपूर्ण बैठक के बाद अपनी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट रूप से सामने रखता है, ताकि किसी तरह की गलतफहमी या एकतरफा व्याख्या की गुंजाइश न रहे। यह रणनीति वैश्विक मंच पर भारत की कूटनीतिक सक्रियता को भी मजबूत करती है।

हालांकि राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी मतभेद बने हुए हैं, लेकिन आर्थिक स्तर पर भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध अब भी जारी हैं। चीन भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। इसके बावजूद भारत लगातार महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने और रणनीतिक निर्भरता कम करने की दिशा में भी काम कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में दोनों देशों के संबंध इस बात पर निर्भर करेंगे कि सीमा विवाद के समाधान की दिशा में कितनी प्रगति होती है। यदि सीमा पर स्थायी शांति स्थापित होती है, तो व्यापार, निवेश और अन्य क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ने की संभावना है। वहीं यदि तनाव बना रहता है, तो दोनों देशों के संबंधों में सामान्य स्थिति लौटने में और समय लग सकता है।

कुल मिलाकर, जयशंकर और वांग यी की बैठक के बाद चीन के आधिकारिक बयान पर भारत की तीखी प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि नई दिल्ली सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के मुद्दे पर किसी भी प्रकार का समझौता करने के पक्ष में नहीं है। भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति और पारस्परिक विश्वास ही दोनों देशों के संबंधों को सामान्य बनाने की पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है।

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