26 सरकारी अस्पतालों में करोड़ों की जरूरी मेडिकल मशीनें पड़ी बेकार, हाईकोर्ट ने जताई गंभीर चिंता

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देश की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी एक गंभीर तस्वीर सामने आई है। हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान बताया गया कि 26 सरकारी अस्पतालों में कई महत्वपूर्ण मेडिकल उपकरण लंबे समय से इस्तेमाल के बिना पड़े हैं। ये मशीनें मरीजों के इलाज, जांच और आपातकालीन सेवाओं के लिए बेहद जरूरी मानी जाती हैं, लेकिन तकनीकी खराबी, रखरखाव की कमी, प्रशिक्षित कर्मचारियों की अनुपलब्धता या दूसरे प्रशासनिक कारणों से इनका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। अदालत ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए अधिकारियों से जवाब मांगा है।

अस्पतालों में आधुनिक उपकरणों की मौजूदगी का मकसद मरीजों को बेहतर और जल्दी इलाज उपलब्ध कराना होता है। लेकिन अगर महंगी मशीनें खरीदने के बाद उन्हें चलाया ही न जाए तो सरकारी धन खर्च होने के बावजूद इसका सीधा फायदा मरीजों तक नहीं पहुंचता। यही वजह है कि अदालत ने इस मामले को केवल प्रशासनिक लापरवाही का मुद्दा नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल से जुड़ा गंभीर विषय माना है।

सुनवाई के दौरान सामने आई जानकारी के अनुसार कई अस्पतालों में जरूरी मशीनें उपलब्ध हैं, लेकिन वे पूरी क्षमता से काम नहीं कर रही हैं। कुछ उपकरणों के खराब होने के बाद उनकी मरम्मत समय पर नहीं हुई, जबकि कुछ मामलों में मशीन चलाने के लिए जरूरी तकनीकी विशेषज्ञ या प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध नहीं था। इसका असर उन मरीजों पर पड़ सकता है जिन्हें जांच या उपचार के लिए निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।

सरकारी अस्पतालों में बड़ी संख्या में ऐसे मरीज आते हैं जो निजी अस्पतालों का महंगा इलाज वहन नहीं कर सकते। उनके लिए सरकारी स्वास्थ्य केंद्र ही सबसे बड़ा सहारा होते हैं। ऐसे में वहां रखे अत्याधुनिक उपकरण अगर लंबे समय तक बंद पड़े रहें तो चिकित्सा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। मरीजों को जांच के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है या उन्हें दूसरे अस्पतालों में भेजना पड़ सकता है।

इस मामले ने मेडिकल उपकरणों की खरीद और उनके रखरखाव पर भी सवाल खड़े किए हैं। अक्सर अस्पतालों के लिए मशीनें खरीदने पर बड़ी रकम खर्च की जाती है, लेकिन खरीद के बाद उनकी नियमित सर्विसिंग, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता की व्यवस्था पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। परिणाम यह होता है कि कुछ साल के भीतर महंगी मशीनें इस्तेमाल से बाहर हो जाती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी अस्पताल में मशीन खरीदना सिर्फ पहला कदम है। उसके बाद उपकरण की इंस्टॉलेशन, कैलिब्रेशन, नियमित मेंटेनेंस, तकनीकी स्टाफ की ट्रेनिंग और समय पर मरम्मत की व्यवस्था जरूरी होती है। अगर इनमें से किसी एक स्तर पर कमी रह जाए तो पूरी प्रणाली प्रभावित हो सकती है।

हाईकोर्ट की चिंता का एक महत्वपूर्ण पहलू मरीजों के अधिकार से भी जुड़ा है। जब सरकार अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए बजट खर्च करती है तो जनता की अपेक्षा होती है कि उन सुविधाओं का वास्तविक लाभ भी मिले। अस्पताल में मशीन मौजूद होने भर से सेवा उपलब्ध नहीं मानी जा सकती। उसे चालू हालत में होना और जरूरत के समय मरीजों के लिए उपलब्ध होना जरूरी है।

इस तरह की स्थिति से सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों पर भी दबाव बढ़ता है। अगर किसी जांच या उपचार के लिए जरूरी मशीन उपलब्ध नहीं है तो डॉक्टरों को वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ती है। इससे इलाज में देरी हो सकती है और गंभीर मरीजों के लिए स्थिति और मुश्किल हो सकती है।

हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब स्वास्थ्य विभाग और संबंधित अस्पताल प्रशासन के सामने यह जिम्मेदारी है कि वे हर अस्पताल में उपलब्ध मशीनों की वास्तविक स्थिति की जानकारी दें। कौन-सी मशीन चल रही है, कौन-सी खराब है, उसे कब से बंद रखा गया है और उसे दोबारा शुरू करने के लिए कितने संसाधनों की जरूरत है—इन सवालों का स्पष्ट रिकॉर्ड होना जरूरी है।

इस मामले से यह भी उम्मीद की जा रही है कि सरकारी अस्पतालों में उपकरणों के लिए एक बेहतर निगरानी प्रणाली तैयार होगी। डिजिटल ट्रैकिंग के जरिए यह देखा जा सकता है कि कौन-सा उपकरण कब खरीदा गया, आखिरी बार कब सर्विस हुआ और कितने समय से बंद है। इससे जिम्मेदारी तय करने और अनावश्यक देरी रोकने में मदद मिल सकती है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में पैसा और मशीन दोनों तभी उपयोगी हैं जब उनका असर मरीज तक पहुंचे। करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद उपकरणों का बेकार पड़े रहना सरकार, अस्पताल प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के लिए गंभीर सवाल खड़ा करता है। यह स्थिति केवल आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि उन मरीजों के लिए भी परेशानी है जो बेहतर इलाज की उम्मीद में सरकारी अस्पताल पहुंचते हैं।

फिलहाल हाईकोर्ट की नजर मामले पर बनी हुई है और अधिकारियों से जवाब तथा सुधारात्मक कदमों की उम्मीद की जा रही है। अब देखना होगा कि 26 सरकारी अस्पतालों में बंद या निष्क्रिय पड़े उपकरणों को कितनी जल्दी चालू किया जाता है और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए क्या व्यवस्था बनाई जाती है। अदालत की यह कार्रवाई सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही, पारदर्शिता और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

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