65 भारतीय भाषाओं और बोलियों को समझने वाला AI Speech Recognition Model जारी, देश की भाषाई विविधता के लिए बड़ी पहल

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भारत की विशाल भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए एक नया AI स्पीच रिकग्निशन मॉडल सामने आया है, जो 65 भारतीय भाषाओं और बोलियों में बोली गई आवाज को टेक्स्ट में बदलने की क्षमता रखता है। इस मॉडल का नाम SraVaani-1.0 है और इसे भारतीय भाषाओं के लिए तैयार किया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह खास तौर पर उन भाषाओं के लिए महत्वपूर्ण है जिनके लिए अब तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्पीच रिकग्निशन तकनीक बेहद सीमित रही है।

भारत में लोग सिर्फ हिंदी, अंग्रेजी या कुछ प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में ही बातचीत नहीं करते। देश में सैकड़ों भाषाएं और हजारों बोलियां इस्तेमाल होती हैं। समस्या यह रही है कि ज्यादातर AI आधारित वॉइस सिस्टम कुछ चुनिंदा भाषाओं पर ही अच्छी तरह काम करते हैं। छोटी भाषाओं और स्थानीय बोलियों में उच्चारण, शब्दों और बोलने के तरीके को समझना इन सिस्टम के लिए मुश्किल रहा है। SraVaani-1.0 इसी कमी को दूर करने की कोशिश करता है।

इस मॉडल को FastConformer आर्किटेक्चर पर तैयार किया गया है। शोध के अनुसार इसे तीन चरणों में विकसित किया गया। पहले चरण में बड़ी मात्रा में बिना लेबल वाले ऑडियो डेटा का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद ऑडियो और तस्वीरों के बीच संबंध समझाने वाले प्रशिक्षण चरण को जोड़ा गया और अंतिम चरण में मॉडल को अलग-अलग भारतीय भाषाओं में लेबल किए गए भाषण डेटा पर प्रशिक्षित किया गया। कुल मिलाकर प्रशिक्षण में करीब 31,000 घंटे से ज्यादा भारतीय भाषाओं के भाषण डेटा का इस्तेमाल किया गया।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत कम संसाधन वाली भाषाओं के लिए इसका उपयोग है। जिन भाषाओं में डिजिटल डेटा कम उपलब्ध होता है, उनके लिए AI मॉडल विकसित करना काफी मुश्किल होता है। ऐसे मामलों में सामान्य सिस्टम अक्सर शब्दों को गलत समझ लेते हैं या स्थानीय उच्चारण के कारण सही ट्रांसक्रिप्शन नहीं दे पाते। SraVaani-1.0 को इसी समस्या को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है और शोधकर्ताओं का दावा है कि इसने कई लो-रिसोर्स और आदिवासी भाषाओं के परीक्षणों में बेहतर प्रदर्शन किया है।

इस तरह का मॉडल रोजमर्रा की जिंदगी में कई काम आ सकता है। सबसे पहले इसका फायदा वॉइस-टू-टेक्स्ट सेवाओं को मिल सकता है। कोई व्यक्ति अपनी स्थानीय भाषा में बोलकर दस्तावेज तैयार कर सकता है, संदेश लिख सकता है या डिजिटल फॉर्म भर सकता है। इससे उन लोगों के लिए डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल आसान हो सकता है जो टाइपिंग की तुलना में बोलकर अपनी बात रखना ज्यादा सुविधाजनक समझते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में भी ऐसी तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। शिक्षक अपनी भाषा में बोलकर डिजिटल नोट्स तैयार कर सकेंगे और छात्रों के लिए स्थानीय भाषाओं में अध्ययन सामग्री बनाना आसान होगा। ग्रामीण और छोटे शहरों में रहने वाले विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा में डिजिटल शैक्षणिक सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में यह तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

सरकारी सेवाओं के लिए भी इसका इस्तेमाल काफी संभावनाएं पैदा करता है। भारत में कई सरकारी योजनाओं और सेवाओं को अलग-अलग भाषाओं में लोगों तक पहुंचाने की कोशिश होती है। अगर नागरिक अपनी स्थानीय बोली में बोलकर किसी डिजिटल सरकारी सिस्टम से बातचीत कर सकें तो भाषा की बाधा काफी हद तक कम हो सकती है। इससे ग्रामीण और कम डिजिटल साक्षरता वाले लोगों को भी फायदा मिल सकता है।

AI आधारित वॉइस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल स्वास्थ्य सेवाओं, ग्राहक सहायता, बैंकिंग और डिजिटल भुगतान जैसे क्षेत्रों में भी बढ़ रहा है। स्थानीय भाषाओं और बोलियों को बेहतर तरीके से समझने वाला मॉडल इन सेवाओं को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में मदद कर सकता है। खासकर ऐसे उपयोगकर्ताओं के लिए, जो अंग्रेजी या प्रमुख भारतीय भाषाओं में सहज नहीं हैं।

इस मॉडल का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह भारत में भाषाई समावेशन की दिशा में बढ़ते काम को दिखाता है। सरकार के BHASHINI जैसे कार्यक्रम भी भारतीय भाषाओं में डिजिटल सेवाओं को बढ़ावा दे रहे हैं। BHASHINI के तहत भाषण से टेक्स्ट, अनुवाद और दूसरी भाषा तकनीकों का इस्तेमाल सरकारी सेवाओं में किया जा रहा है।

हालांकि इस तरह की तकनीक के सामने चुनौतियां भी हैं। किसी भाषा को समझना केवल शब्द पहचानने तक सीमित नहीं है। स्थानीय उच्चारण, संदर्भ, मिश्रित भाषा, शोर और अलग-अलग जिलों में बोलने के तरीके जैसी चीजें भी AI की सटीकता को प्रभावित करती हैं। इसलिए लगातार नए डेटा और वास्तविक उपयोग के आधार पर मॉडल में सुधार करना जरूरी होगा।

फिर भी 65 भाषाओं और बोलियों को कवर करने वाला यह मॉडल भारत की AI यात्रा के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य की AI तकनीक सिर्फ अंग्रेजी या कुछ बड़ी भाषाओं तक सीमित रहने के बजाय भारत की वास्तविक भाषाई विविधता को समझने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

अगर ऐसी तकनीक बड़े स्तर पर भरोसेमंद तरीके से इस्तेमाल होने लगती है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय भाषाओं में वॉइस असिस्टेंट, शिक्षा, सरकारी सेवाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल काफी आसान हो सकता है। भारत जैसे बहुभाषी देश में यही बदलाव AI को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकता है।

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