पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये को लेकर हाल के दिनों में एक बार फिर चर्चा तेज हुई है कि यदि पाकिस्तान पर हमला होता है, तो क्या ये देश उसकी सैन्य मदद के लिए आगे आएंगे। इसी बहस के साथ तथाकथित ‘इस्लामिक NATO’ शब्द भी सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में बार-बार सुनाई दे रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय को भावनाओं के बजाय भू-राजनीतिक तथ्यों के आधार पर समझना जरूरी है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ‘इस्लामिक NATO’ कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं है जैसा कि उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) है। आमतौर पर यह शब्द Islamic Military Counter Terrorism Coalition (IMCTC) के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी स्थापना 2015 में सऊदी अरब की पहल पर हुई थी। इस गठबंधन का घोषित उद्देश्य आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाना है, न कि सदस्य देशों की सामूहिक सैन्य रक्षा करना।
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से करीबी संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, सैन्य प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और प्रवासी संबंध महत्वपूर्ण हैं। पाकिस्तान ने अतीत में सऊदी अरब को सैन्य प्रशिक्षण और सुरक्षा सहयोग दिया है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि करीबी संबंध होने का अर्थ यह नहीं कि हर संभावित संघर्ष में स्वतः सैन्य हस्तक्षेप होगा।
सऊदी अरब की विदेश नीति हाल के वर्षों में अधिक व्यावहारिक और आर्थिक प्राथमिकताओं पर केंद्रित हुई है। वह क्षेत्रीय स्थिरता, निवेश और आर्थिक परिवर्तन कार्यक्रमों पर जोर दे रहा है। इसलिए किसी बड़े भारत-पाकिस्तान सैन्य संघर्ष में सीधे शामिल होने का निर्णय अत्यंत गंभीर और जटिल होगा।
तुर्किये ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान का समर्थन किया है और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग भी बढ़ा है। ड्रोन, सैन्य तकनीक और रक्षा उद्योग में सहयोग चर्चा में रहा है। फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि राजनीतिक समर्थन और प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप दो अलग बातें हैं।
तुर्किये स्वयं नाटो का सदस्य है और उसकी पश्चिमी देशों, मध्य पूर्व और क्षेत्रीय राजनीति से जुड़ी कई प्राथमिकताएं हैं। इसलिए किसी संभावित दक्षिण एशियाई युद्ध में उसकी भूमिका का आकलन केवल बयानबाजी के आधार पर नहीं किया जा सकता।
NATO की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसका अनुच्छेद 5 है, जिसके तहत एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाता है। IMCTC में ऐसा बाध्यकारी सामूहिक रक्षा प्रावधान नहीं है। सदस्य देशों पर किसी दूसरे सदस्य की सैन्य रक्षा करने की कानूनी बाध्यता नहीं है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ ‘इस्लामिक NATO’ शब्द को तकनीकी रूप से भ्रामक मानते हैं।
भारत के लिए इस बहस का महत्व मुख्यतः रणनीतिक और कूटनीतिक है। भारत को तीन स्तरों पर स्थिति का मूल्यांकन करना होता है:

- पाकिस्तान के सैन्य संबंध
- पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति
- बहुपक्षीय मंचों पर समर्थन का समीकरण
हालांकि भारत और सऊदी अरब के संबंध पिछले दशक में काफी मजबूत हुए हैं। ऊर्जा, निवेश, रक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग और प्रवासी भारतीय समुदाय दोनों देशों को जोड़ने वाले प्रमुख कारक हैं। इसी तरह भारत और खाड़ी देशों के बीच आर्थिक संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
तुर्किये के साथ भारत के संबंध अपेक्षाकृत अधिक जटिल रहे हैं। कुछ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर दोनों देशों के दृष्टिकोण अलग रहे हैं। फिर भी व्यापार, पर्यटन और बहुपक्षीय मंचों पर संवाद जारी है। भारत तुर्किये को पूरी तरह विरोधी खेमे में नहीं रखता, बल्कि मुद्दा-आधारित दृष्टिकोण अपनाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप की संभावना से अधिक महत्वपूर्ण हैं:
- हथियार और रक्षा तकनीक सहयोग
- खुफिया सहयोग
- कूटनीतिक समर्थन
- अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बयानबाजी
- आर्थिक या राजनीतिक समर्थन
युद्धकाल में ये तत्व भी रणनीतिक प्रभाव डाल सकते हैं, लेकिन इन्हें सीधे सैन्य गठबंधन के बराबर नहीं माना जा सकता।
भारत पिछले कई वर्षों से बहुस्तरीय विदेश नीति पर काम कर रहा है। एक ओर उसने अमेरिका, फ्रांस, रूस और यूरोपीय देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया है, वहीं दूसरी ओर खाड़ी देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंध भी मजबूत किए हैं। यही संतुलित नीति उसकी बड़ी ताकत मानी जाती है।
मध्य पूर्व में हाल के वर्षों में बड़े बदलाव हुए हैं। सऊदी अरब, यूएई, कतर और अन्य देशों ने आर्थिक विविधीकरण, निवेश और क्षेत्रीय स्थिरता पर अधिक ध्यान देना शुरू किया है। चीन, अमेरिका और यूरोप के साथ उनके संबंध भी बहुआयामी हैं। इसलिए किसी एक धार्मिक पहचान के आधार पर स्वचालित सैन्य एकजुटता मान लेना वास्तविकता को सरल बना देना होगा।
अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ आमतौर पर तीन बातों पर जोर देते हैं:
- IMCTC को NATO जैसा सैन्य गठबंधन नहीं माना जा सकता।
- सऊदी अरब और तुर्किये के पाकिस्तान से अच्छे संबंध हैं, लेकिन प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप की संभावना अलग प्रश्न है।
- भारत को अतिरंजित निष्कर्षों के बजाय दीर्घकालिक रणनीतिक तैयारी, कूटनीति और रक्षा आधुनिकीकरण पर ध्यान देना चाहिए।
‘इस्लामिक NATO’ शब्द राजनीतिक बहसों में आकर्षक लग सकता है, लेकिन वास्तविक भू-राजनीति इससे कहीं अधिक जटिल है। सऊदी अरब और तुर्किये के पाकिस्तान से संबंध महत्वपूर्ण हैं, परंतु उन्हें स्वचालित सैन्य गठबंधन मान लेना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह बदलते क्षेत्रीय समीकरणों पर नजर रखते हुए अपनी कूटनीतिक पहुंच, रक्षा क्षमता और आर्थिक साझेदारियों को मजबूत बनाए रखे। वर्तमान परिस्थितियों में यह बहस भारत के लिए अधिकतर रणनीतिक विश्लेषण का विषय है, न कि तत्काल सैन्य निष्कर्ष का।