अरावली क्षेत्र में खनन से जुड़े मुद्दों की समीक्षा के लिए गठित समिति को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण समूहों ने आरोप लगाया है कि समिति ने उन गांवों का दौरा ही नहीं किया जो अवैध या अत्यधिक खनन से सबसे अधिक प्रभावित बताए जाते हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिना प्रभावित समुदायों से सीधे बातचीत किए किसी भी अध्ययन को पूर्ण नहीं माना जा सकता।
रिपोर्ट्स के अनुसार कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि कई गांवों में भूमि क्षरण, जल स्रोतों के सूखने, धूल प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की शिकायतें लंबे समय से उठाई जा रही हैं। उनका कहना है कि समिति को इन क्षेत्रों का प्रत्यक्ष निरीक्षण करना चाहिए था ताकि स्थानीय लोगों की वास्तविक स्थिति समझी जा सके।
पर्यावरण समूहों ने कहा कि अरावली पर्वतमाला केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि उत्तर भारत के लिए महत्वपूर्ण पारिस्थितिक ढाल है। यह भूजल संरक्षण, जलवायु संतुलन और जैव विविधता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। उनके अनुसार खनन गतिविधियों का प्रभाव केवल पहाड़ियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास की कृषि, जल उपलब्धता और आजीविका पर भी पड़ता है।
कुछ स्थानीय निवासियों ने आरोप लगाया कि उन्हें समिति के कार्यक्रम की जानकारी ही नहीं दी गई। उनका कहना है कि यदि समिति गांवों में आती तो लोग अपने अनुभव और समस्याएं सीधे साझा कर सकते थे। कई ग्रामीणों ने जल संकट और धूल से होने वाली परेशानियों का जिक्र किया।

दूसरी ओर अधिकारियों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि समिति का कार्यक्रम सीमित समय और प्रशासनिक व्यवस्था को ध्यान में रखकर तय किया गया था। उनके अनुसार समिति ने उपलब्ध दस्तावेजों, प्रशासनिक रिपोर्टों और अन्य स्रोतों से जानकारी एकत्र की है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक विस्तृत बयान का इंतजार है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरणीय अध्ययन की विश्वसनीयता काफी हद तक क्षेत्रीय दौरे और समुदाय आधारित परामर्श पर निर्भर करती है। केवल कागजी आंकड़ों के आधार पर निर्णय लेने से कई स्थानीय समस्याएं नजरअंदाज हो सकती हैं। इसलिए प्रभावित गांवों का प्रत्यक्ष निरीक्षण महत्वपूर्ण माना जाता है।
अरावली क्षेत्र लंबे समय से खनन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर चर्चा का केंद्र रहा है। अदालतों और पर्यावरणीय संस्थाओं ने समय-समय पर अवैध खनन पर चिंता जताई है। इसके बावजूद विभिन्न राज्यों में खनन गतिविधियों को लेकर विवाद बने रहे हैं।
कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि समिति पुनः दौरा करे और उन गांवों में सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करे जहां लोग सीधे प्रभावित हैं। उनका कहना है कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी के बिना कोई भी नीति या सिफारिश टिकाऊ नहीं हो सकती।
सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई है। कई लोग पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं, जबकि कुछ लोग क्षेत्र में रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के महत्व पर जोर दे रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि यह मुद्दा केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि विकास और आजीविका का भी प्रश्न बन गया है।
जल विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली क्षेत्र में अत्यधिक खनन भूजल स्तर को प्रभावित कर सकता है। यदि पहाड़ियों की प्राकृतिक संरचना क्षतिग्रस्त होती है तो वर्षा जल संचयन क्षमता घट सकती है, जिसका असर आसपास के क्षेत्रों पर भी पड़ता है।
फिलहाल समिति की रिपोर्ट और आगे की कार्रवाई पर नजर बनी हुई है। कार्यकर्ताओं ने संकेत दिया है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे व्यापक जनसुनवाई और विरोध कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं।
अरावली को लेकर उठे ये सवाल एक बार फिर याद दिलाते हैं कि पर्यावरणीय निर्णयों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है। अब यह देखना होगा कि समिति इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देती है और क्या खनन प्रभावित गांवों का नया दौरा किया जाता है।