उत्तराखंड के चमोली जिले के पीपलकोटी में निर्माणाधीन सुरंग में पानी और मलबा घुसने से बड़ा हादसा हो गया। शुरुआती जानकारी के मुताबिक सुरंग के भीतर अचानक पानी का तेज बहाव आने के बाद कई मजदूर फंस गए। घटना THDC के विष्णुगाड-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना से जुड़ी सुरंग में हुई। हादसे की सूचना मिलते ही पुलिस, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आईटीबीपी और अन्य बचाव एजेंसियों की टीमें मौके पर पहुंचीं और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया।
हादसे के शुरुआती घंटों में करीब छह मजदूरों के फंसे होने की जानकारी सामने आई थी। हालांकि बाद में बचाव अभियान के दौरान स्थिति में बदलाव हुआ और अलग-अलग समय पर मृतकों, बचाए गए मजदूरों और लापता लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग आधिकारिक अपडेट सामने आए। नवीनतम रिपोर्टों में कम से कम सात मजदूरों की मौत और कुछ लोगों के अब भी लापता होने की जानकारी दी गई है। इसलिए शुरुआती संख्या को अंतिम आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा।
बताया गया कि सुरंग के पास भारी बारिश के बीच पहाड़ी हिस्से में हलचल हुई, जिसके बाद पानी और मलबा अचानक सुरंग के अंदर पहुंच गया। पानी का दबाव बढ़ने से अंदर काम कर रहे मजदूरों के लिए बाहर निकलना मुश्किल हो गया। घटना के समय परियोजना स्थल पर करीब दो दर्जन कर्मचारी और मजदूर मौजूद थे। कुछ मजदूरों को सुरंग से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, जबकि बाकी तक पहुंचने के लिए बचाव दल को लगातार मलबा हटाना पड़ा।
रेस्क्यू ऑपरेशन में सबसे बड़ी समस्या सुरंग के अंदर बढ़ता पानी और जमा हुआ मलबा बनी हुई है। बचावकर्मियों को पहले पानी का स्तर कम करने के लिए पंप लगाने पड़े। इसके बाद सुरंग में रास्ता साफ करने और फंसे लोगों तक पहुंचने का प्रयास किया गया। अधिकारियों के अनुसार पानी का प्रवाह और भौगोलिक परिस्थितियां अभियान को कठिन बना रही हैं।

घटना की गंभीरता को देखते हुए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी पीपलकोटी पहुंचे और बचाव अभियान की स्थिति का जायजा लिया। प्रशासन की प्राथमिकता सुरंग के भीतर फंसे लोगों तक जल्द पहुंचना और उन्हें सुरक्षित बाहर निकालना है। घटनास्थल पर एंबुलेंस और चिकित्सा टीमों को भी तैयार रखा गया है, ताकि बचाए गए मजदूरों को तत्काल उपचार दिया जा सके।
हादसे ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में बड़े निर्माण और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। उत्तराखंड का पहाड़ी इलाका भूकंपीय गतिविधियों, भूस्खलन और भारी बारिश के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। ऐसे क्षेत्रों में सुरंग निर्माण के दौरान भूगर्भीय स्थिति की लगातार निगरानी और आपातकालीन निकासी व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण होती है।
इस हादसे की जांच में यह भी देखा जाएगा कि सुरंग के अंदर अचानक पानी आने के पीछे क्या वजह थी। क्या भारी बारिश के कारण पानी का रास्ता बदला, क्या पहाड़ी हिस्से में कोई दरार या भू-धंसाव हुआ, या निर्माण स्थल पर जल निकासी से जुड़ी कोई समस्या थी—इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।
उत्तराखंड में पहले भी सुरंग हादसे हो चुके हैं। नवंबर 2023 में सिलक्यारा-बड़कोट सुरंग में 41 मजदूर फंस गए थे, जिन्हें करीब 17 दिनों तक चले अभियान के बाद सुरक्षित बाहर निकाला गया था। उस घटना ने भी देश में सुरंग निर्माण की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लंबी बहस छेड़ी थी। मौजूदा हादसे के बाद एक बार फिर निर्माण स्थलों पर सुरक्षा मानकों की समीक्षा की मांग उठ सकती है।
प्रभावित मजदूरों के परिवारों के लिए यह समय बेहद मुश्किल है। घटनास्थल से आने वाली हर सूचना पर उनकी नजर बनी हुई है। बचाव टीमों के लिए भी चुनौती बड़ी है, क्योंकि किसी भी जल्दबाजी से सुरंग में मौजूद अन्य हिस्सों के अस्थिर होने का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए अभियान को सावधानी के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।
फिलहाल प्रशासन और बचाव एजेंसियां पूरी ताकत के साथ अभियान में जुटी हैं। हालात लगातार बदल रहे हैं और मृतकों तथा लापता लोगों की संख्या को लेकर आधिकारिक अपडेट आते रह सकते हैं। ऐसे में किसी भी अपुष्ट जानकारी पर भरोसा करने के बजाय प्रशासन और विश्वसनीय समाचार स्रोतों से मिलने वाली नवीनतम जानकारी को ही आधार बनाना जरूरी है।
उत्तराखंड का यह सुरंग हादसा एक बार फिर याद दिलाता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं के साथ सुरक्षा, आपदा तैयारी और श्रमिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना जरूरी है। रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है और अब सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि जिन लोगों तक बचाव दल पहुंच सकता है, उन्हें जल्द से जल्द सुरक्षित बाहर निकाला जाए।