असम और अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर हालिया हिंसा के बाद पैदा हुआ तनाव फिलहाल थोड़ा कम होता दिखाई दे रहा है। ताकाम मिसिंग पोरिन केबांग (TMPK) से जुड़े संगठनों ने अरुणाचल प्रदेश के खिलाफ लगाए गए आर्थिक नाकाबंदी को अस्थायी रूप से रोक दिया है। हालांकि संगठन ने असम सरकार को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है और मांग की है कि सीमा पर हुई गोलीबारी के मामले में चार संदिग्धों को जल्द गिरफ्तार किया जाए।
यह नाकाबंदी सीमा क्षेत्र में हुई एक गोलीबारी की घटना के बाद शुरू की गई थी। रिपोर्टों के अनुसार, असम के धेमाजी जिले के सीमावर्ती इलाके में हुई घटना के बाद स्थानीय स्तर पर काफी गुस्सा देखने को मिला। इसी के विरोध में मिसिंग समुदाय से जुड़े संगठन सामने आए और उन्होंने अरुणाचल जाने वाले वाहनों तथा सामानों की आवाजाही रोकने का फैसला किया। कुछ रिपोर्टों में इस घटना में कई लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है।
नाकाबंदी के कारण दोनों राज्यों के बीच सामानों की आवाजाही को लेकर चिंता बढ़ने लगी थी। असम और अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें और कारोबार एक-दूसरे पर काफी निर्भर हैं। ऐसे में आर्थिक रास्ते बंद होने से सिर्फ राजनीतिक या प्रशासनिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि आम लोगों और छोटे कारोबारियों पर भी असर पड़ सकता है।
TMPK और अन्य संबंधित संगठनों का कहना है कि नाकाबंदी का मकसद सरकार पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाना है। संगठन ने स्पष्ट किया है कि अगर 48 घंटे के भीतर चारों संदिग्धों को गिरफ्तार नहीं किया गया तो आगे की रणनीति तय की जा सकती है। यानी नाकाबंदी रोकना अभी स्थायी समाधान नहीं है, बल्कि फिलहाल सरकार को कार्रवाई का अवसर देने जैसा कदम माना जा रहा है।

सीमा विवाद कोई नया मुद्दा नहीं है। असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच लंबे समय से सीमा निर्धारण और जमीन से जुड़े विवाद रहे हैं। अलग-अलग इलाकों में समय-समय पर विवाद और तनाव की घटनाएं सामने आती रही हैं। हाल की गोलीबारी ने एक बार फिर पुराने विवादों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
इस बार स्थिति इसलिए भी संवेदनशील बन गई क्योंकि गोलीबारी के बाद विरोध प्रदर्शन और आर्थिक नाकाबंदी जैसी कार्रवाई शुरू हो गई। सीमा क्षेत्रों में तनाव बढ़ने पर पुलिस और प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ती है। स्थानीय स्तर पर छोटी घटना भी तेजी से बड़े विवाद का रूप ले सकती है, खासकर तब जब दोनों तरफ के संगठनों और स्थानीय समुदायों की भावनाएं पहले से जुड़ी हों।
दोनों राज्यों के लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में लोग व्यापार, परिवहन, शिक्षा और रोजगार के लिए सीमा के दोनों तरफ आते-जाते हैं। इसलिए लंबे समय तक किसी भी तरह की आवाजाही बाधित होने से आम लोगों को परेशानी हो सकती है। यही वजह है कि नाकाबंदी को अस्थायी रूप से हटाने के फैसले को तनाव कम करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
हालांकि, स्थानीय संगठनों की नाराजगी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। वे चाहते हैं कि गोलीबारी के मामले में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस सुरक्षा व्यवस्था बनाई जाए। 48 घंटे की समयसीमा इस बात का संकेत देती है कि संगठन सरकार के अगले कदम को गंभीरता से देख रहा है।
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका असम और अरुणाचल प्रदेश की सरकारों की होगी। दोनों राज्यों को सीमा विवाद जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीतिक संवाद और प्रशासनिक समन्वय बनाए रखना होगा। सुरक्षा एजेंसियों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी नई हिंसक घटना की स्थिति न बने और स्थानीय लोगों में भय का माहौल पैदा न हो।
विशेषज्ञों के अनुसार, आर्थिक नाकाबंदी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। इससे दोनों ओर के आम लोगों को नुकसान हो सकता है और सीमा संबंधी विवाद और जटिल हो सकता है। लंबे समय के लिए जरूरी है कि विवादित इलाकों में स्थानीय प्रशासन, समुदायों और दोनों राज्यों के अधिकारियों के बीच नियमित बातचीत हो।
फिलहाल नाकाबंदी हटने से सीमा क्षेत्र में सामान्य स्थिति लौटने की उम्मीद जगी है, लेकिन अगले 48 घंटे बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे। अगर सरकार चारों संदिग्धों के खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई करती है तो तनाव और कम हो सकता है। इसके विपरीत कार्रवाई में देरी होने पर विरोध फिर तेज होने की आशंका बनी रहेगी।
कुल मिलाकर, असम संगठन का अरुणाचल प्रदेश के खिलाफ आर्थिक नाकाबंदी को फिलहाल रोकना तनाव कम करने का एक मौका जरूर देता है, लेकिन स्थायी शांति के लिए सिर्फ नाकाबंदी हटना पर्याप्त नहीं होगा। गोलीबारी की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कार्रवाई और दोनों राज्यों के बीच संवाद ही इस संवेदनशील सीमा क्षेत्र में लंबे समय की शांति का रास्ता तैयार कर सकते हैं।