कावेरी जल विवाद एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। सुप्रीम कोर्ट इस सप्ताह तमिलनाडु सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करने जा रहा है जिसमें कर्नाटक से कावेरी नदी का निर्धारित पानी छोड़े जाने की मांग की गई है। सुनवाई को दोनों राज्यों के किसानों और जल प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
तमिलनाडु का कहना है कि उसे कावेरी बेसिन के कई जिलों में खेती के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। राज्य सरकार का तर्क है कि धान और अन्य फसलों की बुआई का समय चल रहा है और यदि समय पर पानी उपलब्ध नहीं हुआ तो किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी कारण उसने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की है।

कर्नाटक का पक्ष अलग है। राज्य सरकार का कहना है कि उसके जलाशयों में उपलब्ध पानी सीमित है और पहले पीने के पानी तथा स्थानीय जरूरतों को प्राथमिकता देना आवश्यक है। कर्नाटक का तर्क है कि कम बारिश और जल भंडारण की स्थिति को देखते हुए तमिलनाडु की पूरी मांग तत्काल पूरी करना व्यावहारिक नहीं है।
कावेरी विवाद नया नहीं है। यह दक्षिण भारत के सबसे पुराने अंतरराज्यीय जल विवादों में शामिल है। कावेरी नदी कर्नाटक से निकलकर तमिलनाडु में प्रवेश करती है और दोनों राज्यों की कृषि अर्थव्यवस्था में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद कावेरी जल प्रबंधन से जुड़ी व्यवस्था बनाई गई थी ताकि पानी के बंटवारे को नियमबद्ध किया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई पर इसलिए भी नजर है क्योंकि पिछले वर्षों में कम बारिश वाले मौसम के दौरान दोनों राज्यों के बीच तनाव बढ़ता रहा है। कई बार कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण की बैठकों में भी पानी छोड़ने की मात्रा को लेकर मतभेद सामने आए हैं। अदालत अब यह देखेगी कि वर्तमान जल स्थिति, बारिश के आंकड़े और पूर्व आदेशों के आधार पर क्या निर्देश दिए जाएं।
तमिलनाडु ने अपनी याचिका में कहा है कि निर्धारित मात्रा में पानी नहीं मिलने से डेल्टा क्षेत्र के किसानों की आजीविका प्रभावित हो रही है। राज्य ने अदालत से अनुरोध किया है कि कर्नाटक को तुरंत पानी छोड़ने का निर्देश दिया जाए ताकि कृषि गतिविधियां जारी रह सकें। वहीं कर्नाटक ने संकेत दिया है कि वह जलाशयों की वास्तविक स्थिति का विस्तृत ब्योरा अदालत के सामने रखेगा।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि कावेरी डेल्टा में खेती काफी हद तक नदी के पानी पर निर्भर है। यदि पानी की आपूर्ति में देरी होती है तो बुआई, सिंचाई और उत्पादन पर असर पड़ता है। दूसरी ओर कर्नाटक के कई क्षेत्रों में भी सिंचाई और पेयजल की जरूरतें बढ़ी हैं, इसलिए विवाद केवल कानूनी नहीं बल्कि संसाधनों के संतुलित उपयोग का प्रश्न भी है।
राजनीतिक स्तर पर भी यह मामला संवेदनशील बना हुआ है। दोनों राज्यों की सरकारें अपने-अपने किसानों के हितों की बात कर रही हैं। तमिलनाडु में विपक्ष और किसान संगठन सरकार से सख्त रुख अपनाने की मांग कर रहे हैं, जबकि कर्नाटक में भी राजनीतिक दल राज्य के जल अधिकारों की रक्षा का मुद्दा उठा रहे हैं।
जल विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान केवल अदालत के आदेशों से नहीं, बल्कि बेहतर जल प्रबंधन, जल संरक्षण, फसल विविधीकरण और राज्यों के बीच सहयोग से निकलेगा। मानसून पर अत्यधिक निर्भरता के कारण हर वर्ष बारिश की स्थिति विवाद को प्रभावित करती है।
सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई से तत्काल राहत मिलती है या नहीं, यह अदालत के निर्देशों पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना तय है कि इस मामले का असर लाखों किसानों, सिंचाई योजनाओं और दक्षिण भारत की जल राजनीति पर पड़ेगा। दोनों राज्यों के लोग अब अदालत की कार्यवाही पर नजर लगाए हुए हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि ऐसा समाधान निकले जिससे किसानों की चिंता कम हो और जल बंटवारे को लेकर तनाव न बढ़े।