बिहार पुलिस ने कानून-व्यवस्था और भीड़ नियंत्रण से जुड़ी ड्यूटी को लेकर हथियारों के इस्तेमाल के नियमों को और स्पष्ट कर दिया है। पुलिस मुख्यालय ने AK-47, INSAS और SLR जैसी ऑटोमैटिक या हाई-पावर असॉल्ट राइफलों को सामान्य कानून-व्यवस्था ड्यूटी में इस्तेमाल करने पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। इन हथियारों को अब केवल ऐसी परिस्थितियों के लिए रखा जाएगा जहां वास्तव में भारी फायरपावर की जरूरत हो, जैसे आतंकवाद रोधी अभियान, नक्सल ऑपरेशन या विशेष सुरक्षा ड्यूटी।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पिछले महीने सीवान में छात्र प्रदर्शन के दौरान एक पुलिसकर्मी द्वारा AK-47 से हवा में फायरिंग का वीडियो सामने आया था। इसके बाद पुलिसकर्मी को निलंबित किया गया था और इस बात पर सवाल उठे थे कि क्या आम प्रदर्शन या कानून-व्यवस्था की स्थिति में इतनी घातक क्षमता वाली राइफल का इस्तेमाल किया जा सकता है। अधिकारियों ने साफ किया था कि संबंधित पुलिसकर्मी ने कथित तौर पर बिना आदेश के हथियार चलाया था।
पुलिस के लिए किसी भी भीड़ या प्रदर्शन से निपटने का पहला विकल्प गोली चलाना नहीं होता। सामान्य व्यवस्था में बातचीत, चेतावनी, बैरिकेडिंग, भीड़ को नियंत्रित करने के उपाय, पानी की बौछार, आंसू गैस और अन्य गैर-घातक साधनों का इस्तेमाल पहले किया जाता है। आग्नेयास्त्रों का इस्तेमाल केवल बेहद गंभीर और जान को तत्काल खतरा पैदा करने वाली स्थिति में अंतिम उपाय के तौर पर किया जा सकता है।

नए निर्देश का उद्देश्य पुलिस कार्रवाई में अनावश्यक बल के इस्तेमाल की संभावना कम करना और सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा को मजबूत करना है। AK-47, INSAS और SLR जैसी राइफलों की फायरिंग क्षमता सामान्य पुलिस ड्यूटी में इस्तेमाल होने वाले हथियारों से काफी अधिक होती है। इसलिए इन्हें नियमित गश्त, सामान्य विरोध प्रदर्शन या रोजमर्रा की कानून-व्यवस्था ड्यूटी में रखने की बजाय विशेष परिस्थितियों के लिए सुरक्षित रखना अधिक उचित माना गया है।
बिहार पुलिस के मौजूदा ढांचे में भी ऐसे हथियारों का इस्तेमाल पूरी तरह सामान्य नहीं माना जाता। नियमों के मुताबिक इन्हें विशेष इकाइयों और उच्च जोखिम वाले अभियानों में तैनात किया जाता है। इनमें एंटी-नक्सल यूनिट, स्पेशल टास्क फोर्स, स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप और विशेष सुरक्षा दल शामिल हैं। इनके इस्तेमाल को संबंधित अधिकारियों के आदेश और ऑपरेशनल जरूरत से जोड़ा गया है।
इस फैसले का सबसे सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा। प्रदर्शन, जुलूस या संवेदनशील कानून-व्यवस्था की स्थिति में लोग अक्सर बड़ी संख्या में पुलिस बल की मौजूदगी देखते हैं। ऐसे मौके पर भारी हथियारों की खुलेआम मौजूदगी से तनाव बढ़ने की आशंका रहती है। सरकार और पुलिस प्रशासन का प्रयास है कि भीड़ नियंत्रण में सुरक्षा और संयम के बीच संतुलन बना रहे।
पिछले सीवान मामले ने पुलिस प्रशिक्षण और जवाबदेही पर भी सवाल उठाए थे। यदि कोई अधिकारी तय प्रोटोकॉल के बिना स्वचालित हथियार का इस्तेमाल करता है तो यह केवल विभागीय नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि गंभीर सुरक्षा चिंता भी बन सकता है। इसी वजह से पुलिस मुख्यालय ने हथियारों की तैनाती और इस्तेमाल के मामलों में स्पष्टता बढ़ाने की जरूरत महसूस की है।
यहां यह समझना जरूरी है कि इसका मतलब यह नहीं है कि बिहार पुलिस से AK-47 या INSAS जैसे हथियार पूरी तरह वापस ले लिए जाएंगे। इनका इस्तेमाल विशेष ऑपरेशन और उच्च खतरे वाली परिस्थितियों में जारी रहेगा। बदलाव मुख्य रूप से इनके नियमित कानून-व्यवस्था कर्तव्यों में इस्तेमाल को लेकर है।
बिहार में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य पुलिस की है। संविधान के तहत पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था राज्य विषय हैं, इसलिए हथियारों की तैनाती और इस्तेमाल का बड़ा हिस्सा राज्य के पुलिस मैनुअल, आदेश और SOP के जरिए नियंत्रित होता है। बिहार पुलिस अधिनियम भी पुलिस महानिदेशक को हथियारों के वितरण और अधिकारियों की ड्यूटी से जुड़े नियम बनाने की शक्ति देता है।
मानवाधिकार के नजरिए से भी यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा सकता है। किसी प्रदर्शन या भीड़ में पुलिस बल की कार्रवाई आवश्यक, न्यूनतम और आनुपातिक होनी चाहिए। अगर भारी हथियारों का इस्तेमाल बिना जरूरत किया जाता है तो मामूली कानून-व्यवस्था की स्थिति गंभीर संघर्ष में बदल सकती है। इसलिए कम घातक विकल्पों को प्राथमिकता देना पुलिसिंग को अधिक सुरक्षित बना सकता है।
आने वाले समय में पुलिस प्रशिक्षण पर भी इसका असर पड़ सकता है। जवानों को यह स्पष्ट रूप से समझाना होगा कि कौन-सा हथियार किस परिस्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता है और वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति की प्रक्रिया क्या होगी। नियमित प्रशिक्षण और मॉक ड्रिल से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि तनावपूर्ण स्थिति में भी जवान तय SOP से बाहर न जाएं।
कुल मिलाकर, बिहार पुलिस का यह फैसला कानून-व्यवस्था में भारी हथियारों के इस्तेमाल को सीमित और उद्देश्यपूर्ण बनाने की कोशिश है। AK-47, INSAS और SLR जैसी राइफलों को विशेष अभियानों तक सीमित रखने से पुलिस कार्रवाई में संयम बढ़ने और आम नागरिकों की सुरक्षा बेहतर होने की उम्मीद है। हालांकि असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नए निर्देशों का जमीन पर कितनी सख्ती से पालन होता है और अधिकारियों की जवाबदेही किस तरह तय की जाती है।