भारत की सुरक्षा को लेकर चीन और पाकिस्तान दोनों ही लंबे समय से महत्वपूर्ण चुनौतियां रहे हैं। दोनों देशों के साथ भारत के अलग-अलग तरह के विवाद और सुरक्षा संबंधी चिंताएं जुड़ी हुई हैं। इसी मुद्दे पर पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने चीन और पाकिस्तान से जुड़े खतरे को लेकर अपनी राय रखी है। उनके बयान के बाद एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि भारत के लिए वास्तविक रूप से सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती किस देश से है।
जनरल एमएम नरवणे भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख रहे हैं और चीन तथा पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा मामलों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है। उनके कार्यकाल के दौरान भारत को पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ लंबे सैन्य तनाव का सामना करना पड़ा था। वहीं, पाकिस्तान के साथ सीमा पार आतंकवाद और नियंत्रण रेखा से जुड़े मुद्दे भी लगातार सुरक्षा नीति का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में दोनों पड़ोसी देशों को लेकर उनका आकलन काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।
चीन की चुनौती मुख्य रूप से भारत की उत्तरी सीमा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ी हुई है। दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर कई क्षेत्रों में सीमा विवाद है। पिछले कुछ वर्षों में लद्दाख क्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच तनाव ने यह दिखाया कि सीमा पर स्थिति कितनी तेजी से गंभीर हो सकती है। चीन ने अपनी सीमा के पास सड़क, सैन्य ढांचे और दूसरी रणनीतिक सुविधाओं को मजबूत किया है। भारत ने भी इसके जवाब में सीमावर्ती इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर और सैन्य क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया है।
पाकिस्तान की चुनौती का स्वरूप चीन से अलग है। भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर, नियंत्रण रेखा और आतंकवाद जैसे मुद्दे लंबे समय से विवाद का कारण रहे हैं। पाकिस्तान की तरफ से सीमा पार आतंकवाद को लेकर भारत लगातार चिंता जताता रहा है। दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव का इतिहास भी रहा है और परमाणु हथियारों के कारण किसी भी बड़े संघर्ष का असर काफी गंभीर हो सकता है।

नरवणे के आकलन को समझने के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है कि चीन भारत के सामने एक बड़ी दीर्घकालिक और रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा जाता है, जबकि पाकिस्तान से जुड़ी चुनौती अधिकतर तत्काल सुरक्षा, आतंकवाद और सीमावर्ती तनाव से जुड़ी रहती है। चीन की आर्थिक, सैन्य और तकनीकी क्षमता भारत की तुलना में काफी बड़ी है। इसके अलावा चीन की पाकिस्तान के साथ रणनीतिक साझेदारी भारत की सुरक्षा गणना को और जटिल बनाती है।
चीन और पाकिस्तान के बीच सहयोग भी भारत के लिए एक अहम चिंता का विषय है। दोनों देशों के रक्षा और आर्थिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC भी दोनों देशों के संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत ने CPEC को लेकर अपनी आपत्ति कई बार जताई है क्योंकि इसका एक हिस्सा उस क्षेत्र से होकर गुजरता है जिस पर भारत अपना दावा करता है।
भारत के लिए चुनौती सिर्फ दो अलग-अलग देशों का सामना करना नहीं है, बल्कि दोनों के बीच संभावित रणनीतिक तालमेल भी है। अगर किसी संकट के दौरान चीन और पाकिस्तान एक-दूसरे के साथ राजनीतिक, सैन्य या कूटनीतिक स्तर पर सहयोग बढ़ाते हैं, तो भारत के सामने दो मोर्चों पर दबाव बढ़ सकता है। इसी कारण भारतीय सेना लंबे समय से ‘two-front challenge’ की संभावनाओं को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति तैयार करती रही है।
हालांकि, भारत की स्थिति भी पहले की तुलना में काफी बदली है। सीमा क्षेत्रों में सड़क और पुलों का निर्माण, सैन्य निगरानी में सुधार, आधुनिक हथियारों की तैनाती और वायुसेना तथा नौसेना की क्षमताओं में बढ़ोतरी ने देश की रक्षा तैयारी को मजबूत किया है। भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में भी अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाई है, जो चीन की बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए महत्वपूर्ण है।
इस पूरे मुद्दे को केवल यह कहकर समझना सही नहीं होगा कि चीन या पाकिस्तान में से कोई एक देश हर परिस्थिति में सबसे बड़ा खतरा है। दोनों से जुड़ी चुनौतियां अलग हैं। पाकिस्तान भारत के लिए तत्काल सीमा सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़ी गंभीर चुनौती बना हुआ है, जबकि चीन की चुनौती लंबे समय तक चलने वाली रणनीतिक, सैन्य, आर्थिक और तकनीकी प्रतिस्पर्धा से जुड़ी है।
कुल मिलाकर, पूर्व सेना प्रमुख नरवणे के अनुभव और आकलन के संदर्भ में चीन को भारत के लिए बड़ी दीर्घकालिक रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा सकता है, जबकि पाकिस्तान की चुनौती अधिक प्रत्यक्ष और सुरक्षा-केंद्रित है। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात किसी एक देश पर ध्यान केंद्रित करना नहीं, बल्कि दोनों मोर्चों पर मजबूत सैन्य तैयारी, कूटनीतिक संतुलन और आर्थिक क्षमता बनाए रखना है। यही रणनीति आने वाले वर्षों में देश की सुरक्षा के लिए सबसे अहम साबित हो सकती है।