आज के समय में बच्चों की परवरिश पहले के मुकाबले काफी बदल गई है। माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए उनकी पढ़ाई, दोस्ती, करियर और रोजमर्रा की जिंदगी पर काफी ध्यान देते हैं। यह चिंता स्वाभाविक है, लेकिन कई बार यही चिंता जरूरत से ज्यादा नियंत्रण में बदल जाती है। बच्चे को हर काम के लिए बताना, उसकी पसंद को बार-बार बदलना या उसकी छोटी-छोटी गलतियों पर तुरंत रोक लगा देना धीरे-धीरे उसके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकता है। अच्छी परवरिश का मतलब बच्चे की हर गतिविधि को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उसे सही दिशा दिखाते हुए खुद फैसले लेने के लिए तैयार करना है।
बच्चे को अपनी बात रखने का मौका दें
बच्चों की सोच को समझने के लिए सबसे पहले उनकी बात सुनना जरूरी है। कई बार माता-पिता बिना पूरी बात सुने ही फैसला सुना देते हैं। अगर बच्चा किसी चीज को लेकर अपनी इच्छा या परेशानी बताता है, तो उसे बीच में रोकने के बजाय ध्यान से सुनें। इससे बच्चे को महसूस होता है कि उसकी राय की भी अहमियत है।
जब बच्चे खुलकर अपनी बात रखते हैं, तो उनके अंदर बातचीत करने और अपनी भावनाओं को समझने की क्षमता विकसित होती है। यही आदत आगे चलकर उन्हें आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखने में मदद करती है।
हर गलती पर डांटना सही नहीं
बच्चे गलतियां करेंगे, क्योंकि गलती करना सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है। अगर बच्चा कोई छोटा गलत फैसला लेता है, तो उसे तुरंत डांटने के बजाय उस फैसले के परिणाम को समझाने की कोशिश करें। उसे बताएं कि क्या गलत हुआ और अगली बार वह स्थिति को बेहतर तरीके से कैसे संभाल सकता है।
जब बच्चे को गलती से सीखने का अवसर मिलता है, तो वह भविष्य में ज्यादा सावधानी से निर्णय लेने लगता है। इसके विपरीत, हर गलती पर डांट पड़ने से बच्चा कई बार अपने फैसले लेने से डरने लगता है।
उम्र के हिसाब से जिम्मेदारी दें
आत्मनिर्भरता की शुरुआत छोटी जिम्मेदारियों से होती है। बच्चे को अपनी किताबें व्यवस्थित करने, स्कूल बैग तैयार करने, खिलौने सही जगह रखने या अपने जरूरी सामान की देखभाल करने जैसी जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं।
शुरुआत में वह इन कामों को पूरी तरह सही तरीके से नहीं कर पाएगा। ऐसे समय में उसकी जगह खुद काम करने के बजाय उसे धीरे-धीरे सुधारने का मौका दें। इससे उसे अपने काम की जिम्मेदारी समझ आएगी और खुद पर भरोसा बढ़ेगा।
बच्चों की तुलना करने से बचें
हर बच्चा अलग होता है। किसी की पढ़ाई अच्छी हो सकती है, कोई खेल में बेहतर हो सकता है और कोई कला या किसी दूसरी गतिविधि में अपनी प्रतिभा दिखा सकता है। इसलिए बच्चों की तुलना उनके भाई-बहन, दोस्त या पड़ोस के बच्चों से करना उनके आत्मविश्वास को कमजोर कर सकता है।
इसके बजाय बच्चे की अपनी प्रगति पर ध्यान दें। अगर उसने पहले से बेहतर प्रदर्शन किया है या किसी काम में मेहनत की है, तो उसकी कोशिश की तारीफ करें। इससे उसे आगे बेहतर करने की प्रेरणा मिलेगी।

सलाह दें, फैसला थोपें नहीं
बच्चे के करियर या भविष्य से जुड़े फैसलों में माता-पिता की सलाह बहुत महत्वपूर्ण होती है। लेकिन सलाह और फैसला थोपने के बीच बड़ा अंतर है। बच्चे की रुचि, क्षमता और पसंद को समझने के बाद उसके साथ मिलकर विकल्पों पर चर्चा करें।
उसे यह समझने दें कि किसी फैसले के फायदे और नुकसान क्या हो सकते हैं। अंतिम निर्णय लेने की प्रक्रिया में उसे शामिल करने से उसकी सोचने और समस्याओं को समझने की क्षमता मजबूत होगी।
प्यार के साथ सीमाएं भी जरूरी हैं
बच्चों को आजादी देने का मतलब यह नहीं कि उन्हें बिना किसी नियम के छोड़ दिया जाए। पढ़ाई, स्क्रीन टाइम, सोने का समय, इंटरनेट और घर के व्यवहार को लेकर उम्र के अनुसार कुछ स्पष्ट नियम जरूरी हैं। लेकिन इन नियमों का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी सिखाना होना चाहिए।
माता-पिता अगर बच्चों को हर समय नियंत्रित करने के बजाय उन्हें समझने, सुनने और सही रास्ता दिखाने पर ध्यान दें, तो बच्चे ज्यादा आत्मविश्वासी बन सकते हैं। उन्हें हर समस्या से बचाने के बजाय समस्याओं का सामना करना सिखाना ज्यादा जरूरी है। आखिरकार, अच्छी परवरिश वही है जिसमें माता-पिता बच्चे के लिए पूरी जिंदगी के फैसले नहीं लेते, बल्कि उसे इतना सक्षम बनाते हैं कि वह आगे चलकर अपने फैसले खुद समझदारी से ले सके।