कर्नाटक हाई कोर्ट ने समलैंगिक जोड़े की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा: टैक्स कानून में ‘स्पाउस’ की परिभाषा पर उठे अहम सवाल

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कर्नाटक हाई कोर्ट ने समलैंगिक जोड़े द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में आयकर अधिनियम के उस प्रावधान को चुनौती दी गई है, जिसके तहत पति-पत्नी के बीच दिए गए उपहार पर टैक्स छूट मिलती है, लेकिन समलैंगिक जोड़ों को इसका लाभ नहीं मिलता। यह मामला समानता, कर कानून और LGBTQIA+ समुदाय के अधिकारों से जुड़ी महत्वपूर्ण कानूनी बहस को नया आयाम दे सकता है।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने समलैंगिक (Same-Sex) जोड़े की ओर से दायर एक महत्वपूर्ण याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। यह मामला आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 56(2)(x) के उस प्रावधान से जुड़ा है, जिसमें पति-पत्नी (Spouse) के बीच दिए गए उपहार को टैक्स से छूट प्राप्त होती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चूंकि भारत में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है, इसलिए उन्हें इस कर छूट से वंचित किया जा रहा है, जो संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

यह याचिका बेंगलुरु के रहने वाले अनुराग कालिया और अखिलेश गोडी ने दायर की है। दोनों आईआईटी के पूर्व छात्र हैं और कई वर्षों से साथ रह रहे हैं। विवाद तब शुरू हुआ जब अखिलेश ने अपनी रिश्ते की सालगिरह पर अनुराग को 22 कैरेट का 14.41 ग्राम वजनी सोने का ब्रेसलेट उपहार में दिया। इस ब्रेसलेट की अनुमानित कीमत 1.15 लाख रुपये थी। मौजूदा आयकर कानून के अनुसार 50,000 रुपये से अधिक मूल्य का उपहार, यदि किसी ऐसे व्यक्ति से मिले जो कानून में परिभाषित ‘रिश्तेदार’ की श्रेणी में नहीं आता, तो उसे कर योग्य आय माना जाता है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि यही उपहार किसी कानूनी रूप से विवाहित विषमलैंगिक (हेटेरोसेक्सुअल) पति-पत्नी के बीच दिया जाता, तो उस पर कोई टैक्स नहीं लगता। लेकिन केवल उनकी यौन अभिरुचि और विवाह को कानूनी मान्यता न मिलने के कारण उन पर कर देनदारी बन रही है। उनका तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 19(1)(a) तथा अनुच्छेद 21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन है।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी. एम. श्याम प्रसाद ने एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाया। अदालत ने पूछा कि जब संसद ने आयकर कानून में “स्पाउस” शब्द की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी है, तो क्या न्यायालय उसकी व्याख्या का दायरा बढ़ा सकता है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि कानून की व्याख्या करते समय उसके व्यापक प्रभावों पर विचार करना आवश्यक होगा। इसी के साथ हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि उनकी याचिका का उद्देश्य समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दिलाना नहीं है। वे केवल यह चाहते हैं कि कर कानून में उन्हें समान व्यवहार मिले और केवल यौन अभिरुचि के आधार पर उन्हें टैक्स छूट से वंचित न किया जाए। उनका कहना है कि यह मामला विवाह की वैधता नहीं बल्कि कराधान में समानता का है।

गौरतलब है कि वर्ष 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार किया था, लेकिन केंद्र सरकार को LGBTQIA+ समुदाय से जुड़े अधिकारों और सुविधाओं पर विचार करने के लिए एक समिति गठित करने की बात कही थी। इसके बाद भी विभिन्न अदालतों में समलैंगिक जोड़ों के कर, उत्तराधिकार, बीमा और अन्य नागरिक अधिकारों से जुड़े मामले सामने आते रहे हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कर्नाटक हाई कोर्ट में चल रही यह सुनवाई भविष्य में कर कानूनों की व्याख्या और LGBTQIA+ समुदाय के नागरिक अधिकारों पर दूरगामी प्रभाव डाल सकती है। यदि अदालत याचिकाकर्ताओं के पक्ष में कोई महत्वपूर्ण टिप्पणी या आदेश देती है, तो इससे समानता के सिद्धांत पर आधारित अन्य कानूनी सुधारों का रास्ता भी खुल सकता है। फिलहाल सभी की नजर केंद्र सरकार के जवाब और अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हुई है।

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