भारत-चीन सीमा को लेकर चीन ने स्थिति “सामान्यतः स्थिर” बताई, बातचीत और शांति पर जोर

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भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक गतिविधियां तेज हैं। इसी बीच चीन ने सीमा पर मौजूदा हालात को “सामान्यतः स्थिर” बताया है। यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच सीमा प्रबंधन, सैन्य संवाद और आपसी रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिशें जारी हैं। भारत ने भी बार-बार कहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता दोनों देशों के व्यापक द्विपक्षीय संबंधों के लिए बेहद जरूरी है।

चीन का यह बयान हाल में नई दिल्ली में हुई भारत-चीन सीमा मामलों पर बातचीत के बाद आया है। दोनों देशों ने मौजूदा संवाद तंत्र के जरिए सीमा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की और सैन्य तथा कूटनीतिक चैनलों को सक्रिय रखने पर जोर दिया। दोनों पक्षों के बीच यह सहमति बनी है कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए बातचीत जारी रहनी चाहिए।

भारत और चीन के रिश्तों पर वर्ष 2020 के गलवान संघर्ष का गहरा प्रभाव पड़ा था। उस हिंसक झड़प में भारत के 20 सैनिक और चीन के चार सैनिक मारे गए थे। इसके बाद दोनों देशों ने सीमा पर बड़ी संख्या में सैनिक और सैन्य संसाधन तैनात किए थे। कई दौर की बातचीत के बाद तनाव कम करने के लिए कदम उठाए गए और 2024 में दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत के बाद संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य दिशा में ले जाने की कोशिश तेज हुई।

हाल के दिनों में अरुणाचल प्रदेश के एक सीमावर्ती इलाके में भारतीय और चीनी गश्ती दलों के आमने-सामने आने की खबरें भी सामने आई थीं। कुछ मीडिया रिपोर्टों में सीमावर्ती क्षेत्र में चीनी गतिविधियों और अस्थायी तंबुओं का जिक्र किया गया। हालांकि भारतीय रक्षा अधिकारियों ने इन रिपोर्टों को अप्रमाणित और असत्यापित बताया। इससे साफ है कि सीमा पर स्थानीय स्तर की घटनाओं को लेकर दोनों पक्षों की सूचनाएं और आकलन अलग हो सकते हैं।

चीन की ओर से “सामान्यतः स्थिर” वाला बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संकेत देता है कि बीजिंग फिलहाल सीमा पर हालात को नियंत्रण से बाहर नहीं मान रहा। चीन ने साथ ही इस बात पर जोर दिया है कि दोनों देश राजनयिक और सैन्य चैनलों के जरिए संवाद बनाए रखें। इसका उद्देश्य छोटी घटनाओं को बड़े तनाव में बदलने से रोकना और सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखना है।

भारत का रुख भी काफी स्पष्ट रहा है। नई दिल्ली ने कहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता उसके लिए बेहद गंभीर विषय है और इसका असर पूरे भारत-चीन संबंधों पर पड़ता है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने हाल की बातचीत में सीमा प्रबंधन, सीमा निर्धारण, समन्वय के तंत्र और सीमा-पार सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा की जानकारी दी थी।

विशेषज्ञों के मुताबिक, सीमा पर स्थिरता का मतलब यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच सभी विवाद समाप्त हो चुके हैं। भारत और चीन के बीच लगभग 3,488 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा है, जिसके कई हिस्सों में वास्तविक सीमा का अंतिम निर्धारण नहीं हुआ है। इसी वजह से गश्त के दौरान दोनों पक्षों की गतिविधियां कभी-कभी एक-दूसरे से टकराव की स्थिति पैदा कर सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में सैन्य कमांडरों के बीच सीधा संपर्क और स्थापित प्रोटोकॉल काफी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

सीमा विवाद के साथ-साथ भारत और चीन अपने व्यापक द्विपक्षीय संबंधों को भी धीरे-धीरे आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, सीधी उड़ानों और अन्य संपर्कों को लेकर भी पिछले कुछ समय में सकारात्मक संकेत देखने को मिले हैं। हालांकि रणनीतिक अविश्वास अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और सीमा विवाद दोनों देशों के रिश्तों में सबसे संवेदनशील मुद्दों में बना हुआ है।

आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि सीमा पर यह स्थिरता कितनी स्थायी रहती है। दोनों देशों को जमीनी स्तर की छोटी घटनाओं को राजनीतिक या सैन्य संकट बनने से रोकना होगा। इसके लिए नियमित कमांडर स्तर की बैठकें, राजनयिक संवाद और भरोसा बढ़ाने वाले कदम जरूरी होंगे।

फिलहाल चीन का “सामान्यतः स्थिर” वाला बयान तनाव कम करने की दिशा में सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि वास्तविक प्रगति का आकलन केवल बयानों से नहीं, बल्कि सीमा पर सैनिक तैनाती, गश्त व्यवस्था और बातचीत के परिणामों से होगा। भारत और चीन के बीच स्थायी शांति के लिए लगातार संवाद और जमीनी स्तर पर भरोसा बढ़ाना ही सबसे बड़ी जरूरत बनी हुई है।

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